
रात का सन्नाटा था। चाँद की धुंधली रोशनी खिड़की से होकर कमरे में आ रही थी। मेज़ पर एक अधूरी चिट्ठी रखी थी, जिसकी स्याही अभी भी गीली थी। यह चिट्ठी आरव ने अनुष्का के नाम लिखी थी, लेकिन कभी भेज नहीं पाया।
आरव और अनुष्का की दोस्ती कॉलेज से शुरू हुई थी। वह दोस्ती कब प्यार में बदल गई, उन्हें पता ही नहीं चला। अनुष्का हँसते हुए कहती –“आरव, अगर कभी हम दूर भी हो गए तो वादा करना, तुम मुझे कभी भूलोगे नहीं।”आरव मुस्कुराकर जवाब देता –“अनुष्का, तू मेरी साँसों में है, तुझसे दूर कैसे रहूँगा?”
लेकिन ज़िंदगी के खेल अजीब होते हैं। पढ़ाई पूरी होते ही अनुष्का की शादी उसकी मर्ज़ी के बिना दूसरे शहर में कर दी गई। आरव के पास सिर्फ उसकी यादें और वो अधूरी चिट्ठी रह गई।
वह चिट्ठी में लिखता –“तेरे बिना यह शहर वीरान है, तेरे बिना हर खुशी अधूरी है। लोग कहते हैं वक्त सब ठीक कर देता है, पर वक्त ने तो मुझे और भी अधूरा बना दिया है…”
आँखों से आँसू टपकते गए, कागज़ भीगता गया और शब्द धुंधले हो गए।
कई साल गुजर गए। आरव अब एक सफल लेखक बन चुका था। उसकी किताबें लाखों दिलों को छू लेती थीं। पर सच तो यह था कि उसकी हर किताब, हर कहानी, उस अधूरी चिट्ठी का ही एक हिस्सा थी।
एक दिन किताबों के मेले में, अचानक किसी ने उसे पुकारा –“आरव…!”उसने पीछे मुड़कर देखा। यह वही आवाज़ थी, जिसे वह सालों से अपने ख्वाबों में सुनता आया था।वह अनुष्का थी।
दोनों की आँखें भर आईं। न शब्द थे, न शिकायत… बस खामोशी और आँखों की नमी। अनुष्का ने धीमे से कहा
–
“तुम्हारी किताबें मैंने पढ़ी हैं। तुमने कभी मुझे भुलाया ही नहीं…”आरव ने मुस्कुराकर जवाब दिया –“भुलाता तो लिखता क्या?”
उस पल लगा जैसे अधूरी चिट्ठी आखिरकार पूरी हो गई हो।
